नई दिल्ली: भारत के जीवंत लोकतंत्र में ‘असहमति’ और ‘विरोध’ हमेशा से मूल आधार रहे हैं। लेकिन हाल के दिनों में जिस तेज़ी से राजनीतिक मंचों, चुनावी रैलियों और जन-आंदोलनों में भाषा की मर्यादा का हनन हो रहा है, उसने देश के बुद्धिजीवियों, विश्लेषकों और आम नागरिकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या देश के सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार और गरिमा की सीमाएं पूरी तरह धुंधली हो चुकी हैं?
1. शीर्ष नेतृत्व और नेताओं के बयानों पर सवाल
राजनीतिक बहस में भाषा का यह क्षरण केवल किसी एक दल तक सीमित नहीं है। विश्लेषकों का मानना है कि जब शीर्ष स्तर के नेता मंचों से व्यक्तिगत कटाक्ष करते हैं, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है:
महिलाओं के प्रति अमर्यादित टिप्पणियाँ: अतीत से लेकर वर्तमान तक, चुनावी रैलियों में महिला नेताओं या विपक्ष से जुड़ी महिलाओं के खिलाफ इस्तेमाल किए गए तीखे शब्द देश के राजनीतिक संवाद में गलत मिसाल कायम कर चुके हैं।
विवादित शब्दावली: सार्वजनिक मंचों से विपक्षी दलों या नेताओं के खिलाफ अति-आक्रामक और असंसदीय भाषा का प्रयोग अब आम होता जा रहा है।
संस्थाओं का अपमान: सोशल मीडिया पर चरमपंथी ट्रोल्स द्वारा देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI), न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के खिलाफ की जाने वाली अभद्र बयानबाज़ी चिंता का बड़ा कारण है।
2. आंदोलनों में गूंजते अभद्र नारे: NEET प्रोटेस्ट का उदाहरण
भाषा का यह गिरता स्तर अब केवल नेताओं की रैलियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह ज़मीनी स्तर पर आंदोलनों और युवाओं के बीच भी प्रवेश कर चुका है।
हाल ही में NEET परीक्षा में हुई गड़बड़ियों के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान, जब युवाओं और छात्रों ने देश के सर्वोच्च पद (प्रधानमंत्री) के खिलाफ बेहद अमर्यादित और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया, तो इस मुद्दे ने और तूल पकड़ लिया।
विश्लेषण: परीक्षाओं में पारदर्शिता, छात्रों का भविष्य और सरकार की नीतियों पर कड़े सवाल पूछना हर नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। लेकिन जब विरोध की शैली में ‘मुद्दों’ की जगह ‘गाली-गलौज’ ले लेती है, तो न केवल आंदोलन की गंभीरता कम होती है, बल्कि मूल समस्या से भी ध्यान भटक जाता है।
3. “जैसा बोओगे, वैसा काटोगे” – समाज पर पड़ता असर
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जब देश का शीर्ष नेतृत्व या बड़े नेता अपनी भाषा पर नियंत्रण नहीं रखते, तो वही संस्कृति ज़मीनी कार्यकर्ताओं, समर्थकों और युवाओं में फैलती है। सोशल मीडिया की ‘ट्रोल कल्चर’ ने इस स्थिति को और भयानक बना दिया है, जहाँ असहमति व्यक्त करने का मतलब केवल सामने वाले को अपमानित करना रह गया है।
💡 समाधान: राजनीतिक और सामाजिक सुधार की दिशा
राजनीतिक गलियारों और सार्वजनिक जीवन में सुधार लाने के लिए विशेषज्ञों ने निम्नलिखित कदमों को आवश्यक बताया है:
राजनीतिक दलों का आंतरिक ‘Code of Conduct’: सभी राजनीतिक दलों को अपने नेताओं, प्रवक्ताओं और कार्यकर्ताओं के लिए एक सख्त आचार संहिता तय करनी चाहिए। अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वालों पर तुरंत दलीय कार्रवाई होनी चाहिए।
मुद्दों पर आधारित विरोध: प्रदर्शनकारियों और युवाओं को यह समझना होगा कि मर्यादा में रहकर, तर्कों के साथ की गई मांग अधिक मजबूत और प्रभावी होती है।
मीडिया और जनता की जवाबदेही: सनसनीखेज और भड़काऊ बयानों को टीआरपी (TRP) देने के बजाय नीतिगत मुद्दों पर बहस को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। साथ ही, जनता को भी अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल करने वाले नेताओं का बहिष्कार करना होगा।
माँ, बहन, बेटी या किसी भी व्यक्ति का सम्मान और पद की गरिमा किसी राजनीतिक दल की सीमा में बंधकर नहीं रह सकती। यदि लोकतंत्र को मजबूत और पारदर्शी बनाए रखना है, तो देश के नेताओं से लेकर आंदोलनकारी युवाओं तक—सभी को सार्वजनिक विमर्श में ‘भाषा की शुचिता’ और ‘सभ्य संवाद’ की ओर वापस लौटना ही होगा।
सार्वजनिक विमर्श में गिरती मर्यादा: क्या राजनीतिक गलियारों और प्रदर्शनों में अब ‘भाषा के सुधार’ की सख्त ज़रूरत है?

