प्रयागराज में शंकराचार्य परंपरा के शिष्यों पर हमला, धर्म और विवेक पर उठे गंभीर सवाल

प्रयागराज: संगम नगरी प्रयागराज में शंकराचार्य परंपरा से जुड़े शिष्यों पर हुए हमले ने धार्मिक सहिष्णुता, परंपरा और सामाजिक विवेक पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। यह घटना केवल कुछ व्यक्तियों पर हमला नहीं मानी जा रही, बल्कि उस परंपरा पर प्रहार के रूप में देखी जा रही है, जो ज्ञान, संयम, शास्त्रार्थ और अहिंसा की प्रतीक रही है।
प्रत्यक्षदर्शियों और संत समाज से जुड़े लोगों का कहना है कि संगम घाट क्षेत्र में जिस तरह का दृश्य सामने आया, उसने सभी को स्तब्ध कर दिया। भगवा वस्त्रधारी व्यक्तियों के बीच ही हिंसा का होना कई सवाल छोड़ गया है। जिस भगवा को त्याग, तपस्या और शांति का प्रतीक माना जाता है, उसी रंग पर खून के धब्बे दिखाई देना समाज के लिए चिंताजनक संकेत माना जा रहा है।
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि शंकराचार्य की परंपरा कभी भी बल प्रयोग या हिंसा की समर्थक नहीं रही है। यह परंपरा विचार-विमर्श, शास्त्रार्थ और बौद्धिक संवाद पर आधारित रही है। ऐसे में मतभेदों को सुलझाने के लिए लाठी, पत्थर और हिंसा का सहारा लिया जाना उस मूल परंपरा के विपरीत है, जिसका दावा किया जाता है।
इस घटना को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि जब एक भगवाधारी दूसरे भगवाधारी पर हमला करता है, तो दोष किसे दिया जाए—आस्था को, परंपरा को या उस राजनीति को, जिसने धर्म को सत्ता और वर्चस्व का माध्यम बना लिया है। आलोचकों का कहना है कि धर्म की रक्षा के नाम पर हिंसा को जायज ठहराना स्वयं धर्म की सबसे बड़ी क्षति है।
सबसे अधिक चर्चा उन स्वयंभू धर्म रक्षकों की चुप्पी को लेकर हो रही है, जो अक्सर छोटे-छोटे मुद्दों पर संस्कृति और राष्ट्र के संकट की बात करते हैं, लेकिन साधु-संतों और शिष्यों पर हुए हमले पर मौन दिखाई दे रहे हैं। इसे नैतिक साहस की कमी के रूप में देखा जा रहा है।
प्रयागराज की यह घटना केवल एक स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी मानी जा रही है। यदि भगवा की आड़ में हिंसा को स्वीकार्यता मिलती रही, तो आशंका है कि यह रंग अपने मूल अर्थ और गरिमा को खो देगा। संत समाज और बुद्धिजीवियों का कहना है कि धर्म की रक्षा नारेबाज़ी से नहीं, बल्कि आचरण से होती है। अन्यथा यह हिंसा केवल वस्त्रों पर नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना पर स्थायी दाग बनकर रह जाएगी।
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